Saturday, 2 January, 2010

भावुकता को मिटाना है॥

भावनाओं के तूफानों नें
जाने कितने चमन उजाडे
झंझाबातों को ये लाकर
कितनी बनती बात बिगाडे
मैनें अब यह जान लिया
अब खुद को है पहचान लिया
भावुकता के इस बन्धन में
कभी नहीं अब जीना है,
भावुकता को मिटाना है॥

अब तक जिनका साथ दिया
सदा ही जिसने प्रतिघात किया
नहीं समझ सका जिनको मैं
सदा ही जिसने ये दर्द दिया
फिर भी साथ निभाना है
भावुकता को मिटाना है॥

क्यूं उनके पीछे भागूं मैं?
क्यूं उन्को अपना समझू मैं?
खुद की दुनियाँ भी अब तो बसाना है
भावुकता को मिटाना है॥

भावना के अविरल प्रवाह में
जानें कितने डूब गये
बस एक किनारा को अब पाकर
कभी न अश्रु बहाना है
भावुकता को मिटाना है॥

छल दम्भद्वेष आदि की महफिल में
है भावना से सरोकार किसे?
भावुकता है सदा तेजरहित
तज तेज नही अब जीना है
भावुकता को मिटाना है॥

भावुकता के वशीभूत हो
विश्वामित्र है तपभंग किये
भावुकता के ही वशीभूत हो
हुमायुँ है सैन्य निवर्त किये
भावना के ही वशीभूत हो
जाने कितने संहार हुये
भावुकता के इस जकडन से
खुद को सदा बचाना है
भावुकता को मिटाना है॥

भावुकता सी सैन्य नहीं
है भावुकता नही दैन्य कोई
भावुकता के इस अन्तर्द्वन्द्व को
खुद को नहीं अब समझाना है
भावुकता को मिटाना है॥

भावुकता व निज संघर्षों मे
उत्थान पतन तो होंगे ही
भावुकता से मल्लयुद्ध में
इन बातों से नही घवराना है।
भावुकता को मिटाना है॥ भावुकता को मिटाना है॥

०६-०८-०५

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