Monday 7 July 2008

संकलित पंक्तिया

~तस्वीर्~
मुझसे मत पूछ की क्यूं आंख् झुका ली मैनें,
तेरी तस्वीर थी जो तुझ् से छुपा ली मैने,
जिस पे लिखा था की तू मेरे मुकद्दर में नहीं,
अपने माथे की वो लकीर मिटा ली मैंनें,
हर जनम सबको यहां सच्चा प्यार् कहां मिलता है ,
तेरी चाहत मे तो उम्र बिता ली मैंनें,
मुझको जाने कहां एहसास् मेरे ले जायें,
व॔त् के हाथों से एक् नज़्म् उठा ली मैंनें,
घेरे रहती है मुझे एक् अनोखी खुशबू,
तेरी यादों से हर् एक् सांस् सजा ली मैंनें,
जिसके शेरों को वो सुनके बहुत् रोया था,
बस् वोही एक् गज़ल् सबसे छुपा ली मैंनें.
***

~जिन्दगी~
लम्हा लम्हा ज़िन्दगी का बटोर् रहा हूं
बिखरी हुई दुनिया को बटोर् रहा हूं
ख्वाब् जो कभी पूरे नहीं हो सकते
आज् उन् टूटे ख्वाब् को जोर् रह हूं
गीली आंखों के बहते पानी से
अप्ने ही दामन् को कर् शराबोर् रहा हूं
कितने ही राहों पे फूलों पे चल्
आज् काटों से मूंह् मोर् रह हूं
कलम् की सिअयाही खतम् होने पर
कतरे के लिए दिल् निचोर् रहा हूं
कुछ ही पल् कीतो है ज़िन्दगि
तो आज् मौत् को क्यों कर् दूर् रहा हूं***

~दामन्~
यूं न मुझको देख् तेरा दिल् पिघल् न जाये
मेरे आंसूयों से तेरा दामन् जल् न जाये
वो मुझसे फिर् मिला है आज् ख्वाबों में
ए खुदा कहीं मेरी नीन्द् खुल् न जाये
पूछा न कर् सब् के सामने मेरी कहानी
कभी तेरा नाम् होठों से निकल् न जाये
जी भर् के देख् लो मुझको तुम् सनम्
क्या पता फिर् ज़िन्दगी की शाम् ढल् न जाये
***
~चिराग् में~
जब् कोई जुनून् आता है दिमाग् में
अपना खून् डाल् देता हूं चिराग् में
एक् चेहरा बन् जाता है मेरी आखों से
एक् सूरत् छुपी हुई है दिल् के दाग् में
दर्द् के सिवा मुझको मिला कुछ् भी नहीं
मैने दिल् लगाया था खुशियों की लाग् में
लपटों में मुझको देख् कर् मायूस् होते है न्
झोंक् तो देते है न् मेरे खत् वो आग् में
कांटों से अपना दामन् भर् के लाया हूं
मिल् गया था एक् शख्स् फूलों के बाग् में

ये पंक्तिया विभिन्न स्थानों से संकलित है......

Friday 6 June 2008

मेरी ऋषिकेश / हरिद्वार यात्रा

इतना आलसी क दुबारा हो आए आप लोगो से बात तक नही कर सका
इसबार तो लेक्चरार के इन्टरव्यू के लिए gayaa thaa

Tuesday 20 May 2008

क्यों ?


क्यों ?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?
है चान्द अकेला है चान्दनी अकेली,
क्यों फिर साथ निभाये दुनियां की?
है दिवस अकेला है निशा अकेली,
क्यों आश लगाये तारों की?
है गगन अकेला है धरा अकेली,
क्यों धैर्य बन्धाये नव सर्जन की?
है स्रष्टा अकेला है सृष्टि अकेली,
क्यों चिंतन हो फ़िर मानव की?
है हर प्राणी जव यहां अकेला,
क्यों याद करे मृगतृष्णा की?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?

कैसे...?
माना सभी हैं यहां अकेले,
पर सृष्टिचक्र को कैसे भुलायें?
कैसे कह दें मैं नवसृष्टि का प्राणी,
नवजीवन है इस वसुधा पर।
कैसे कह् दें "कोइ नहीं मेरा"?
जो है बस इक सपना है.
कैसे कह दें यह जीवनलीला ,
मृगत्रुष्णावत इक क्रीडा है?
यही सोच सखे!! याद सताये-
है अपनों की घरवालों की।
यही सोच...........
बिपिन झा
२३-०४-२००५

Friday 18 April 2008

मधुशालैकादशी

एकदा मम जीवने आगता प्रियमधुवाला
चषकं दत्वा साऽयाचत् अत्यल्पम् किल् सा हाला।
किन्तु न जाने का भूता यदा निवर्तिता कृतपूर्णीहाला
तस्या: प्रियायाः तृष्णायामतृप्ता मे मधुशाला॥

परिवर्तित-कालैः सह वेषव्यसन- परिवर्तिताः
धर्मरहितास्ते कर्मरहिताः कर्माकर्म न तैः ज्ञाताः।
पानम्मेवधर्मस्तेषान्त्येवागच्च्छन्त्यिह यदि मधुशालां
किन्न जाने पास्यस्यपि इच्छन्नपि तां मधुशालां॥

पातुं मदिरा निर्गच्छन्ति सर्वे गृहात्तु इह लोके
मिलिष्यत्यपि तं सुधारसं योऽधिगमिष्यति मधुशालां।
कटुसत्यम नहि ते पानार्हाः इच्छन्तोपि ता


होलीत्युत्सवेन धर्मािभेदाः दूरीकृताः
ृणाद्वेष-कुण्ठिते मनसि प्रेमपुष्प विकासिता।
ाल्गुनोत्सवस्य भावना प्रत्यंगेऽनया सिञ्चिता
पर्वोऽयं यत् एकदा करोति सदा करोत्ययं मधुशाला॥

कस्यापि पानं कस्यापि प्राणं
कस्यापि देवः कस्यापि शत्रुः।
प्रतिभावनास्ति इह यद्यपि
पुनरप्येका मधुशाला॥

विस्मरतु स्वदुःख वेदनाम्तो दत्तमाश्रयम्
किन्तु कृतम्मे त्वम् निरादरम् कृत्वाकलहं तारणम्।
अतोभूताऽपमानिता इयमहम्मे किल हाला
भो कृतघ्नाः शृणु नागच्छतु पुनरप्यत्र मधुशाला॥

सुखसमये ये अग्रे पृष्टे दुःखसमये नागच्छन्त्यालोके
सदा कथयन्ति त्वया सहैवेति कार्ये समये पृष्टे यान्ति।
सुख समये तव सुखं वर्धयति दुखसमयेऽपि शान्तयते
भो मित्र यदि सत्सङ्गिनी सेयं सेयं मधुशाला॥

कांक्षे तव जीवने करिष्येऽहं ज्यतिर्ज्वालनम्
कामं न मे जीवने तव करणं दीपवत् वासम्।
कटुसत्यम् नहि कोऽप्यत्र यो न कांक्षते मधुशाला
किञ्चित्कालं सहानुभूतिं ददात्विति शिक्ष्यते मधुशाला।।

प्रेमदिवस एकदा मन्यते येन रक्तपातोऽल्पि कारयति
वर्षस्य प्रति दिवस घृणादिवस सम कुर्वन्नपि न शर्म लभते।
न कोऽपि कथयति तं किमपि यः वितरति विषयुक्ता हाला
किन्तु सर्वे निन्दन्ति यदा मधु वितरति मधुशाला॥

कोऽपि मन्दिर मार्गं दर्शयति अन्ये मस्जिद्द्वारं
कोऽपि गुरोः द्वारं दर्शयति अने गिजागेहम्
किन्तु यदि न मार्गम् प्राप्स्यसि स्मरतु स्मरतु त्वम् मधुशाला
यैः जीवनमार्गं शिक्ष्यते मे प्रियेयं मधुशाला॥


भो पाठक धर्मशास्त्रविदत्वम्
नाववोधयत्विमम् किल हाला
जीवनपथनिर्देशिकेयम् मधुयुक्ता
मधुरिक्तेयं मधुशाला

१९\१२\२००३
०२:४०