Saturday, 2 January, 2010

कैसे मन का दीप जलाऊँ?

इन अन्धेरी रातों में
कैसे मन का दीप जलाऊँ?
अंजान शहर की इन राहों में
किसको अपना गीत सुनाऊँ?
जहाँ न कोई रिश्ता नाता
फिर क्यूं मन है वहीं पे जाता?
मेरी बेबस दिल की बातें
क्यूं ये मन उस तक पहुंचाता?
नहीं कभी थी चाहत जिससे
फिर क्यूं आज है चाहत उससे?
धूप-छाँव के जीवन में ये
क्यों प्यास जगाया मिलकर उससे?
जब कोई नहीं है इस जहाँ में
कैसे मिलकर प्यास बुझाऊँ?
इन अन्धेरी रातों में
कैसे मन का दीप जलाऊँ?
अंजान शहर की इन राहों में
किसको अपना गीत सुनाऊँ?


२८-०४-०५ २१:१०

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