Monday, 29 March, 2010

प्रणय की तुम बात न करना प्रेयसी ।



प्रणय की तुम बात न करना प्रेयसी ।

प्रणय की तुम बात न करना प्रेयसी ।
दुनियाँ निष्ठुर दिल है कोमल ,
मर्दित करते हैं ये जैसे मदगज उत्पल,
नहीं कभी तुम मुझे याद आना
नहीं कभी तुम भूल ये  जाना

नहीं जानता जब मैं तुझको,
नहीं स्मृति मे है रूप तुम्हारी
नहीं समझ सका अब तक तुमको 
फिर कहाँ जहाँ में ढूंढूं तुमको


मेरे दृगमें तुम उल्लास नभरना
सुनों सखि! प्रणय की तुम बात न करना।
कोई कहे है  तुझको सुन्दर
कोई कुरूप है बतलाता
ऐसे में सुनो प्रेयसी 
प्रणय की तुम बात न करना प्रेयसी ।

प्रणय नहीं ये काम्य नहीं ये काम्य भाव जो
टिका रहे इन अंगो पर
प्रणय नहीं वो विष का प्याला
चिरनिद्रा तक तक जो साथ है दे पाए
प्रणय नहीं वो दृढ वक्र अयस
जो तत्पजनों को और तपाते
प्रणय नहीं धन जन यौवन
क्षणभर का साथ निभाकर
फिर आगे बढते जाते
इसीलिये हूं आज मैं कहता
प्रणय की तुम बात न करना।
प्रेयसी प्रणय की तुम बात न करना  ।

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