Friday, 6 June 2008

मेरी ऋषिकेश / हरिद्वार यात्रा

इतना आलसी क दुबारा हो आए आप लोगो से बात तक नही कर सका
इसबार तो लेक्चरार के इन्टरव्यू के लिए gayaa thaa

Tuesday, 20 May 2008

क्यों ?


क्यों ?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?
है चान्द अकेला है चान्दनी अकेली,
क्यों फिर साथ निभाये दुनियां की?
है दिवस अकेला है निशा अकेली,
क्यों आश लगाये तारों की?
है गगन अकेला है धरा अकेली,
क्यों धैर्य बन्धाये नव सर्जन की?
है स्रष्टा अकेला है सृष्टि अकेली,
क्यों चिंतन हो फ़िर मानव की?
है हर प्राणी जव यहां अकेला,
क्यों याद करे मृगतृष्णा की?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?

कैसे...?
माना सभी हैं यहां अकेले,
पर सृष्टिचक्र को कैसे भुलायें?
कैसे कह दें मैं नवसृष्टि का प्राणी,
नवजीवन है इस वसुधा पर।
कैसे कह् दें "कोइ नहीं मेरा"?
जो है बस इक सपना है.
कैसे कह दें यह जीवनलीला ,
मृगत्रुष्णावत इक क्रीडा है?
यही सोच सखे!! याद सताये-
है अपनों की घरवालों की।
यही सोच...........
बिपिन झा
२३-०४-२००५