जैसे सिन्धुज (लवण) एवं सिन्धु (सागर) दोनों का ही सम्पर्क घाव को उद्वेलित करता है उसी तरह सज्जन में छिपा दुर्जन आपके जीवन को उद्वेलित कर देता है। कहा भी अस्तु, ऐसे सज्जनों से दूर रहें.... यह ब्लाग मूलतः हिन्दी भाषा में सर्जना को प्रस्तुत करता है......
Thursday, 12 June 2008
Friday, 6 June 2008
मेरी ऋषिकेश / हरिद्वार यात्रा
इतना आलसी क दुबारा हो आए आप लोगो से बात तक नही कर सका
इसबार तो लेक्चरार के इन्टरव्यू के लिए gayaa thaa
इसबार तो लेक्चरार के इन्टरव्यू के लिए gayaa thaa
Tuesday, 20 May 2008
क्यों ?

क्यों ?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?
है चान्द अकेला है चान्दनी अकेली,
क्यों फिर साथ निभाये दुनियां की?
है दिवस अकेला है निशा अकेली,
क्यों आश लगाये तारों की?
है गगन अकेला है धरा अकेली,
क्यों धैर्य बन्धाये नव सर्जन की?
है स्रष्टा अकेला है सृष्टि अकेली,
क्यों चिंतन हो फ़िर मानव की?
है हर प्राणी जव यहां अकेला,
क्यों याद करे मृगतृष्णा की?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?
कैसे...?
माना सभी हैं यहां अकेले,
पर सृष्टिचक्र को कैसे भुलायें?
कैसे कह दें मैं नवसृष्टि का प्राणी,
नवजीवन है इस वसुधा पर।
कैसे कह् दें "कोइ नहीं मेरा"?
जो है बस इक सपना है.
कैसे कह दें यह जीवनलीला ,
मृगत्रुष्णावत इक क्रीडा है?
यही सोच सखे!! याद सताये-
है अपनों की घरवालों की।
यही सोच...........
बिपिन झा
२३-०४-२००५
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?
है चान्द अकेला है चान्दनी अकेली,
क्यों फिर साथ निभाये दुनियां की?
है दिवस अकेला है निशा अकेली,
क्यों आश लगाये तारों की?
है गगन अकेला है धरा अकेली,
क्यों धैर्य बन्धाये नव सर्जन की?
है स्रष्टा अकेला है सृष्टि अकेली,
क्यों चिंतन हो फ़िर मानव की?
है हर प्राणी जव यहां अकेला,
क्यों याद करे मृगतृष्णा की?
हम हैं अकेले हैं आप अकेली,
क्यों याद सताये अपनों की?
कैसे...?
माना सभी हैं यहां अकेले,
पर सृष्टिचक्र को कैसे भुलायें?
कैसे कह दें मैं नवसृष्टि का प्राणी,
नवजीवन है इस वसुधा पर।
कैसे कह् दें "कोइ नहीं मेरा"?
जो है बस इक सपना है.
कैसे कह दें यह जीवनलीला ,
मृगत्रुष्णावत इक क्रीडा है?
यही सोच सखे!! याद सताये-
है अपनों की घरवालों की।
यही सोच...........
बिपिन झा
२३-०४-२००५
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