Saturday, 28 March 2009

प्रलय

प्रलय
क्या तुमनें देखा है प्रलय का मंजर ?
निस्तब्ध जगत दुःखद करुण क्रंदन,
रंग बिरंगे इस दुनियां में शून्य सा स्पंदन,
झंझवातें वो सर्वत्र कम्पन,
रग रग में टूटता आस
जहां नहीं कहीं पर विश्वास,
कहां से ये धरती फट जाए
होश किसे जो ये बतलाये,
एक क्ष में बैठे इन्हीं आंखो से
मैनें देखा प्रलय का मंजर
सर्वत्र जलाप्लावन तथा अजब सा कम्पन
इन्द्रदेव के कुपित दृष्टि चंचला से पूरित हो
बचा हुआ था अब तक कक्ष हमारा
बचे हुए थे कुछ प्राणी बाहर
भूत जिन्हें हम कहते थे
श्वेत धवल वो स्निग्ध काया
क्षभर रुककर किंचित वो मुस्काए
'रे स्वार्थी प्राणी ' कुछ यों वे होठ हिलाए
मैं इस प्रलय में बाहर हूं
तू अन्दर सोता है
पता नहीं शायद तुझको
प्रलय से कुछ शेष नहीं रहता है
तभी झटित एक हवा का झोंका आया
झोंका था या अदम्य साहस
कहां गए वो खिड़की कहां गया वो दरवाजा
होश किसे जो ये बतलाये
लगता है प्रलय जब होता है
कुछ हालत ही ऐसा होता है
कोई किसी का नहीं रहजाता है
रक्तिम वर्ण जगत का होकर
भीषण विध्वंस संवलित हो कर
अपने शक्ति का आभान करता है
यही प्रलय कहलाता है
नूतन सृष्टि का जनक होकर|

Saturday, 14 March 2009

गुस्ताखी माफ़ हो........

प्रिय पाठक बन्धु
बहुत दिनों पहले मैंने विचार किया था की आप सबों से बातें करू पर हो न सकी
चलिए आज तो मुखातिव हूं...
आप लोंगो को जल्द ही मृगत्रुश्ना नामक उपन्यास जो की मैथिलि मे है पढनें को मिलेगा

यह मूलतः मिथिला क्षेत्र से सम्बंधित है पर जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों से इसका ताल्ल्लुकात है सो pls wait..

Monday, 7 July 2008

संकलित पंक्तिया

~तस्वीर्~
मुझसे मत पूछ की क्यूं आंख् झुका ली मैनें,
तेरी तस्वीर थी जो तुझ् से छुपा ली मैने,
जिस पे लिखा था की तू मेरे मुकद्दर में नहीं,
अपने माथे की वो लकीर मिटा ली मैंनें,
हर जनम सबको यहां सच्चा प्यार् कहां मिलता है ,
तेरी चाहत मे तो उम्र बिता ली मैंनें,
मुझको जाने कहां एहसास् मेरे ले जायें,
व॔त् के हाथों से एक् नज़्म् उठा ली मैंनें,
घेरे रहती है मुझे एक् अनोखी खुशबू,
तेरी यादों से हर् एक् सांस् सजा ली मैंनें,
जिसके शेरों को वो सुनके बहुत् रोया था,
बस् वोही एक् गज़ल् सबसे छुपा ली मैंनें.
***

~जिन्दगी~
लम्हा लम्हा ज़िन्दगी का बटोर् रहा हूं
बिखरी हुई दुनिया को बटोर् रहा हूं
ख्वाब् जो कभी पूरे नहीं हो सकते
आज् उन् टूटे ख्वाब् को जोर् रह हूं
गीली आंखों के बहते पानी से
अप्ने ही दामन् को कर् शराबोर् रहा हूं
कितने ही राहों पे फूलों पे चल्
आज् काटों से मूंह् मोर् रह हूं
कलम् की सिअयाही खतम् होने पर
कतरे के लिए दिल् निचोर् रहा हूं
कुछ ही पल् कीतो है ज़िन्दगि
तो आज् मौत् को क्यों कर् दूर् रहा हूं***

~दामन्~
यूं न मुझको देख् तेरा दिल् पिघल् न जाये
मेरे आंसूयों से तेरा दामन् जल् न जाये
वो मुझसे फिर् मिला है आज् ख्वाबों में
ए खुदा कहीं मेरी नीन्द् खुल् न जाये
पूछा न कर् सब् के सामने मेरी कहानी
कभी तेरा नाम् होठों से निकल् न जाये
जी भर् के देख् लो मुझको तुम् सनम्
क्या पता फिर् ज़िन्दगी की शाम् ढल् न जाये
***
~चिराग् में~
जब् कोई जुनून् आता है दिमाग् में
अपना खून् डाल् देता हूं चिराग् में
एक् चेहरा बन् जाता है मेरी आखों से
एक् सूरत् छुपी हुई है दिल् के दाग् में
दर्द् के सिवा मुझको मिला कुछ् भी नहीं
मैने दिल् लगाया था खुशियों की लाग् में
लपटों में मुझको देख् कर् मायूस् होते है न्
झोंक् तो देते है न् मेरे खत् वो आग् में
कांटों से अपना दामन् भर् के लाया हूं
मिल् गया था एक् शख्स् फूलों के बाग् में

ये पंक्तिया विभिन्न स्थानों से संकलित है......